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  2016-10-15

क्या छत्तीसगढ़ में असफल हो रहा है डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान?

OnlineCG News। शिक्षा जीवन को संवारने का कार्य करता है। वर्तमान समय में गुणवत्ता युक्त शिक्षा पर बहस छिड़ी हुई है। और पालक जिस आर्थिक बोझ और छात्र जिस अतिरिक्त भार को सहने पर मजबूर हैं, वो है ट्यूशन। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षा के खराब स्तर को सुधारने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान चलाया जा रहा है। इसके बावजूद इन स्कूलों के बच्चों की निर्भरता ट्यूहशन पर बढ़ती जा रही है। खुलासा हुआ है कि 23 फीसदी पालक बच्चों को ट्यूशन भेजने लगे हैं, जो आंकड़ा पहले 15 फीसदी था। एक स्वयंसेवी संगठन की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं। प्रथम संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक 2010-11 में जहां सरकारी प्राइमरी स्कूल में ट्यूशन न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 85.9 था। वह 2014-15 में घटकर 77.8 फीसदी रह गया है। यह कहें कि वर्तमान में 23 फीसदी पालक अपने बच्चों को कोचिंग या ट्यूशन पढ़ा रहे हैं। अपर प्राइमरी में 2010-11 में जहां 89 फीसदी बच्चे ट्यूशन नहीं लेते थे, लेकिन अब इनका प्रतिशत 84.3 प्रतिशत रह गया। यानी करीब 16 फीसदी बच्चे ट्यूशन ले रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में 7 करोड़ से ज्यादा छात्र कोचिंग या ट्यूशन का सहारा लेते हैं। यह कुल छात्रों की तादाद का लगभग 26 फीसदी है। ग्रामीण क्षेत्र में एक पालक एक बच्चे के लिए हर महीने 100 से 300 स्र्पए खर्च कर रहा है। वहीं शहर में 300 स्र्पए से लेकर 1500 स्र्पए प्रति छात्र राशि खर्च की जा रही है।

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