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प्रदेशभर में धूमधाम से मनाया गया छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेर-छेरा

OnlineIndia न्यूज। छत्तीसगढ़ का लोक पर्व छेरछेरा जो प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के दिन बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर पूरे प्रदेशभर में बच्चों सहित युवाओं की टोली घर-घर जाकर छेरछेरा मांगते देखे गए। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दौरान लोग घर-घर जाकर अन्न का दान मांगते हैं। इतना ही नहीं गांव के युवक घर-घर जाकर डंडा नृत्य भी करते हैं। कहते हैं कि धान मिसाई हो जाने के कारण गांव में घर-घर धान का भंडार हो जाता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा मांगने वालों को दान करते हैं। छेरछेरा को लेकर कुछ प्राचीन लोक कथाएं भी प्रचलित है। बताया जाता है कि एक समय जब कोशलाधिपति कल्याण साय जी दिल्ली राज्य में राजपाठ, युद्ध विद्या की शिक्षा ग्रहण करने के लिए 8 वर्षो तक रहे। बाद में जब शिक्षा समाप्त हो गई हो वे सरयू नदी के तट से किनारे होते हुए ब्राम्हणों के साथ छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर वापस पहुंचे। जब इस बात की जानकारी छत्तीसगढ़ की प्रजा को हुई तो वे अपने राजा के स्वागत में रतनपुर पहुचने लगे और राजा के वापस लौटने की खुशी में नाचने गाने लगे। जब राजा महल पहुंचे तो रानी ने भी उनका स्वागत किया और महल के छत के ऊपर से अपनी प्रजा को दान के रूप में अन्न, धन और सोने चांदी बाटे। इसके बाद प्रजा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए राज महल का खजाना और अन्नागार सदैव भरे रहे ऐसा आशीर्वाद दिया। जिसके बाद राजा कल्याण ने पौष पूर्णिमा के दिन हमेशा छेरछेरा त्यौहार मनाने का फरमान जारी किया। तब से लेकर आज तक पौष पूर्णिमा के दिन पूरे छत्तीसगढ़ के लोग पारम्परिक रूप से छेरछेरा का त्यौहार मानते आ रहे हैं।

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