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Pooja Sharma   2018-07-26

स्त्री के साथ हुए दुराचार का दंड सदियों से भोग रहा है यह जंगल

OnlineIndia डेस्क। हिन्दू धर्म से जुड़े पौराणिक ग्रंथों में कई ऐसे पात्र और स्थानों का वर्णन है जोकी बहुत ही रहस्यमय हैं। कुछ स्थानों के विषय में तो आमजन जानते ही नहीं हैं। जैसे विंध्याचल से लेकर गोदावरी तट तक फैला हुआ विशाल वन। श्री राम ने अपने वनवास के दौरान विंध्याचल पर्वत से लेकर गोदावरी तक फैले इस वन में कई दिनों तक वास किया था। लगभग 93 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले इस वन में आज छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इस वन को दण्डकारण्य के नाम से जाना जाता है। वन का नाम सुनते ही आपके मन में सवाल उत्पन्न करता है की भगवान राम के निवास करने के बाद इस वन का नाम सहज ना होकर दण्डकारण्य कैसे पड़ा तो आपको बता दें की इसके पीछे एक अजब-गजब कथा वाल्मीकि रामायण में मिलती है।
दाण्डकारण्य वन के पीछे की यह है पौराणिक कथा
सतयुग में मनु के पुत्र महान राजा इक्ष्वांकु हुए थे। सूर्यवंश को स्थापित करने वाले इस राजा के सौ पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटा पुत्र मंदबुद्धि था। दरअसल उसका आचरण धर्मसंगत नहीं था, वह अपने पिता की एक बात नहीं मानता था। जिसकी वजह से उनके पिता उससे रुष्ट रहते थे। इसी कारण से उसका नाम दंड रखा गया था क्योंकि प्रसिद्ध राजा इक्ष्वांकु के कुशल राजपाठ के लिए वह एक सजा के समान ही प्रतीत होता था। अपने पुत्र के ऐसे आचरण के चलते राजा ने उसे खुद से दूर कर लिया। जिसके लिए उसे विंध्य और शैवल पर्वतों से घिरे पूर्वी-मध्य भारत का शासन सौंपा गया। वहीं राजा ने शुक्राचार्य को दंड का गुरु बनाया, ताकि पुत्र अपने किसी कृत्य के चलते भविष्य में परेशानी का सामना न करना पड़े। उसी दौरान अपने राज्य मधुमंता में स्थित गुरु शुक्राचार्य के आश्रम जाकर दंड ने शास्त्रों का अध्ययन करने का निर्णय लिया। उस सुंदर आश्रम में गुरु की रूपवती कन्या अरजा भी रहा करती थीं। एक दिन दंड की उस पर कुदृष्टि पड़ गई और मर्यादा को भूलकर उसके साथ दुराचार कर बैठा।
गुरु शुक्राचार्य ने दिया था श्राप
जब अरजा ने अपने पिता से पूरी घटना बताई तो अपनी पुत्री की दशा देखकर गुरु शुक्राचार्य क्रोधित हो गए। अब तक आश्रम में एक अच्छे और अनुशासित छात्र के तौर पर शास्त्रों का अध्यापन कर रहे दंड को गुरु ने यह श्राप दे डाला कि अगले सात दिनों के भीतर उसका सारा राजपाठ सहित नाश हो जाएगा। यहां तक कि उसके राज्य से सौ कोस दूर तक श्राप के प्रभाव से श्मशान सा नजारा दिखेगा, जहां किसी भी जीवित जीवजंतु का कोई चिह्न शेष नहीं बचेगा। उसके बाद गुरु शुक्राचार्य अपनी पुत्री से कहा कि वह उसी आश्रम में सरोवर के निकट रहकर ईश्‍वर की आराधना करें। जो जीव इस अवधि में उसके निकट रहेंगे वे नष्ट होने से बच जाएंगे। और इस तरह महान सूर्यवंशी राजा इक्ष्वांकु के पुत्र दंड का सामूल नाश हो गया। जिस राज्य में कभी सुख-सम्पन्नता की धारा बहा करती थी, वहां सात दिनों के बाद श्मशान जैसा सन्नाटा पसर गया। जहां कुछ समय पश्चात ऐसा घना जंगल उत्पन्न हुआ जिसके भीतर सूर्य भी प्रवेश नहीं कर सकता है। इसके बाद से ही उस स्थान का नाम दण्डकारण्य पड़ गया।
शास्त्रों में भी है वर्णन
इतिहास में इस स्थान का कई जगह वर्णन मिलता है। दंडकारण्य में रहने वाले लोगों को दंडक कहा जाता है। यह स्थान हर युग में चर्चा का विषय रहा। त्रेतायुग में इस जंगल में आकर योगी और संन्यासी तप किया करते थे, इस स्थान पर आकर ध्यान करने से उनकी एकाग्रता अपने चरम पर पहुंच जाती थी। राम, लक्ष्मण और सीता जब वनवास के लिए निकले थे, तब दंडकारण्य के आसपास भी उन्होंने निवास किया था।

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